यूनीवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन

Dialogue dy:  बात का मोल
by  कुसुम जैन

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glossed version.
                  ( नेहा अपनी बड़ी नन्द मालिनी के घर पहुँचती है।  छोटी नन्द प्रमोद भी वहाँ है। )
मालिनी :  नेहा भाभी,  तुम्हें पहुँचने में इतनी देर कैसे हुई ?
   प्रमोद :  शुक्र करो,  पहुँच गई नेहा भाभीजी।  आजकल तो ये कोर्ट में इतनी बिज़ी रहती हैं कि
           इन्हें फ़ुरसत ही नहीं किसी से मिलने की।
   नेहा :  भई हाईकोर्ट से कोई स्कूटर नहीं मिल रहा था।  सब सदर बाज़ार का नाम सुन के
           भाग जाते।
मालिनी :  फिर कैसे आईं तुम
?
     नेहा :  बस एक स्कूटर में बिना कुछ पूछे पहले बैठ गई।  फिर कहा उससे सदर बाज़ार चलने
           के लिए।  ये तो ख़ैर रोज़मर्रा की बात है।  अब आगे सुनो।  आज एक गहरी सचाई
           समझने को मिली।
मालिनी :  बताओ।
   नेहा :  स्कूटर वाला नया था।  लगता है कभी पहले सदर बाज़ार आया नहीं था।  और न
           आज के बाद कभी आये शायद।
मालिनी :  क्यों
?
     नेहा :  जब फ़लि्मिस्तान पहुँचे और सदर की तरफ़ मुड़े तब वह छोटी सड़क पर इतनी भीड़
           पैदल चलने वालों की और रिक्शा
,  तांगे,  ठेले,  साइकिल,  स्कूटर वालों की,  पटरियों के
           किनारे खोमचेवालों और रेढ़ीवालों के जाल में या चक्रव्यूह में जैसे फँस
-सा गया हो।
           वह बिलकुल घबरा गया था।
मालिनी :  तो ये तो कोई नई बात नहीं हुई।
   नेहा :  उसके लिए थी।  वो हैरानी में मुझपर तरस खाता हुआ बोला
,  "  बहनजी,  आप यहाँ
           कैसे रहती हैं
?  ये भी कोई जगह है रहने की?   यहाँ तो दम घुटता है।   ( थोड़ा चुटकी
           लेते हुए
 )  सोच लो,  असल में ये तुम लोगों के बारे में कह रहा था। मैं तो यहाँ कभी
           रह ही नहीं सकता।
"
मालिनी :  बाहर वाले ऐसा ही सोचते हैं सदर वालों के बारे में।
   नेहा :  मैंने कहा
, " भई,  यहाँ बहुत करोड़पति रहते हैं।  सदर बाज़ार उत्तर भारत के थोक,  यानी
           होलसेल व्यापार का बड़ा भारी केन्द्र है।  रोज़ करोड़ों का व्यापार होता है यहाँ।
"  उसे
           यक़ीन ही नहीं हो रहा था।  सिर हिलाकर कहने लगा कि
करोड़पति क्या ऐसे इलाक़े
           में रहते हैं
?  वो तो बड़ी-बड़ी कोठियों में रहते हैं ! "  बड़ी अकड़ में बोल रहा था।
मालिनी :  असली बात बताओ न
!
     नेहा :  तुम लोगों में सब्र नहीं सुनने का।  मैं उसे यहाँ के लोगों और जीवन और इतिहास के बारे
           में कुछ बताने लगी कि इतने में तुम्हारा घर आ गया।  ४॰ रुपए बने।  मैंने उसे पचास
           का नोट दिया।  उसके पास बीस का नोट था।  मेरे पास भी १॰ का नोट नहीं था।
  प्रमोद :  तो क्या हुआ।  किसी से भी तुड़वा लेता।
   नेहा :  यहीं से तो असलियत सामने आई।  मेरे कहने पर उसने दोनों तरफ़ के रेढ़ी वालों और
           छाबड़ी वालों से पूछा।  और निराशा से सिर हिलाता हुआ लौट आया मेरे पास कि
           नहीं मिला।  मेरी कुछ समझ नहीं आया।  ऐसा कैसे कि किसी से बीस का नोट नहीं टूटा
?
मालिनी :  ये तो,  सच,  हैरानी की बात है।  तो तुम ऊपर से मँगवा लेतीं।
   नेहा :  तुम्हारा घर चौथी मंज़िल पर।  बिल्कुल जैसे कुतुब मीनार पर चढ़ रहे हो।  हाँ तो
           मैंने उससे कहा कि तुम सामने वाली दुकान से माँग लो।  वह वहाँ से भी ख़ाली हाथ
           लौट कर मुझे सुनाता है कि
आप तो कह रही थीं कि यहाँ करोड़पति रहते हैं।  ये बीस
           रुपए का छुट्टा तो दे नहीं सकते
! "
मालिनी :  मुझे भी पहेली सी लग रही है।
   नेहा :  मैं भी बहुत परेशान थी।  वह मेरी बात को झूठी साबित कर रहा था।  मैं ये जानने के
           लिए कि दाल में काला क्या है
,  ख़ुद उतर पड़ी।  पहले उसी सामने वाली दुकान पर गई।
           कहा कि
भाई साहब,  क्या ये २॰ रुपए के दो नोट देंगे ?  बड़ी मेहरबानी होगी। "  उसने
           खटाक से अपने मुनीम से कहा कि
बहन जी को बीस का नोट तोड़ दो। "  अब मैं और
           भी हैरान।  मैं उससे पूछूँ कि आपने स्कूटर वाले को क्यों मना किया
?  उसने ख़ुद ही
           कहा कि
बहनजी,  स्कूटर वाले को बात करनी नहीं आती।  बड़ी अकड़ में बोल रहा था।
           उस में तमीज़ नहीं है बात करने की।

  प्रमोद :  तो ये थी राज़ की बात।
    नेहा :  हाँ
,  पहेली का जवाब।  अब मैं स्कूटर वाले के पास आई।  कहा कि लो मिल गए।  अब
           वह हैरान
,  पूछने लगा कि मुझे कैसे मिल गये ?  तब मैंने कहा कि यहाँ के रहनेवालों के लिए
           पैसे से ज़्यादा बात का मोल होता है।  कबीर दास ने ऐसे नहीं कहा था
?
कागा काको देत है,  कोयल कासो लेत।     
मीठी वाणी बोल के
,  जग बस में कर लेत।

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Drafted 13-14 June 2001. Posted 18-19 June 2001.