यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन
Dialogue dq: चोरी (4)
by कुसुम जैन
(used with author's permission)
To glossed version.
( )
गुप्ता : सीमा, मेरा एक दोस्त मेरे इलाक़े के
थाने में है। अगर छोटू उनको
चोरों का पता-ठिकाना
दिखा दे और पकड़वा दे तो काम हो सकता
है।
सीमा : बोल, छोटू। मदद करेगा ?
छोटू : हाँ,
करूँगा, बीबीजी।
गुप्ता : मेरा दोस्त कह रहा था कि
चोर चोरी कर-करा के
सुबह ४ बजे तक अपने ठिकाने आ
जाते हैं।
तो हमें ४ बजे के बाद ही -
मतलब सुबह अँधेरे ही
- उनके अड्डे पर पहुँचना
होगा। हम आगे
और पुलिस पीछे।
सीमा : यह तो अच्छा प्लैन है,
तो कल सुबह ही हो
जाये।
गुप्ता : ठीक है। मैं अभी
फ़ोन कर देता हूँ और पक्का कर लेता
हूँ।
( अगले दिन प्लैन के मुताबिक़
दोनों चोर पकड़ लिये जाते
हैं और थाने में बंद कर दिए
जाते हैं।
समीर - सीमा के घर
टेलीफ़ोन की घंटी बजती है। )
सीमा : हेलो।
जी, मैं मिसज़
मेहरा बोल रही हूँ।
आवाज़ : मैं इन्स्पैक्टर सिंहा थाने
से बोल रहा हूँ। चोरों
ने चोरी कबूल कर ली है। अब बस आप
अपने ड्राइवर
को भेज दीजिये तो उसके साथ
चोरों के ठिकाने पर सारा सामान मिल
जाएगा।
सीमा : क्या पुलिस की गाड़ी ठीक नहीं
रहेगी ?
आवाज़ : आपकी गाड़ी से काम जल्दी
हो जाएगा। नहीं तो परमिट वगैरह
बनवाने में देर हो जाये।
सीमा : ठीक है, मैं मोहन को भेज देती
हूँ थाने में।
( मोहन रात को १॰ बजे निराश थका
हुआ वापस घर आता है। )
सीमा : कहाँ रहे सारा
दिन ? क्या हुआ ?
मोहन : क्या बताऊँ,
बीबीजी ? सारा
काम बिगड़ गया। कुछ सामान नहीं मिला।
सीमा : शुरू से बताओ। क्या
हुआ ?
मोहन : जब मैं
थाने पहूँचा तो वहाँ दो चोर
थे। उन्होंने सब कबूल कर लिया था कि
वो कैसे
आए और क्या-क्या सामान लिया और कैसे गए।
उन्होंने कहा कि तुम्हारे ही
मेज़पोश
में सामान बाँध कर
ले गये थे।
सीमा : अच्छा। फिर वो सही चाँदी वाली
केतली क्यों छोड़ गए ?
मोहन : हाँ,
बीबीजी। मैंने जब यही
सवाल किया तो बोले कि चमकने वाले
बरतन गिलेट के
होते हैं,
इसलिए नहीं लिया।
सीमा : हाँ, वो
बाबूजी अभी चमकवा कर लाए थे तो इसलिए बच
गयी। फिर ?
मोहन : हम वहाँ से
गाड़ी में बैठे और जहाँ चोर
बताते वहीं जाते। फिर एक जगह एक घर
में पहुँचे।
वहाँ पर उस इलाक़े के थाने वाले आ
गये। वहाँ सारी कहानी बदल गई।
सीमा : कैसे ?
मोहन : जो
पुलिसवाला हमें ले गया था वह कहने
लगा नीचे उतरकर कि इन्होंने चोरी
नहीं की है।
सीमा : तो वो दबाव में आ गया।
मोहन : बीबीजी, नीचे वाले पड़ोसी कह रहे थे
कि इस घर में तो रोज़ पुलिस आती है
और यहाँ
तो रोज़ चोरी का
सामान आता है। नई-नई
घड़ियाँ पहनते हैं ये लोग।
सीमा : इससे तो लगता है कि
चोरियाँ करवाई जाती हैं, और लोगों को चोर
बनवाया जाता है।
जाल फैलाए जाते
हैं, पुलिस के
पूरे संरक्षण में। यह है
असलियत।
(to be continued)
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Drafted 6-7 June 2001. Posted 8 June 2001.