यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन
इन्स्टिट्यूट फ़ॉर द स्टडी ऑफ़
लैंग्वजिज़ ऐंड कल्चर्ज़ ऑफ़
एशिया ऐंड ऐफ़्रिका
तोक्यो
यूनिवर्सिटी ऑफ़ फ़ाॅरेन स्टडीज़
Mellon Project
प्रेमचन्द
गोदान
(Devanagari text reconstituted from Professor K. Machida's roman
transcription)
Chapter Fourteen.
(unparagraphed text)
होरी की फ़सल सारी की सारी डाँड़
की भेंट हो चुकी थी।
वैशाख तो किसी तरह कटा, मगर जेठ लगते-लगते घर में अनाज का एक दाना
न रहा।
पाँच-पाँच
पेट खानेवाले और घर में अनाज
नदारद।
दोनों जून न मिले,
एक जून तो मिलना ही चाहिए।
भर-पेट न
मिले, आधा पेट
तो मिले।
निराहार कोई कै दिन रह सकता है!
उधार ले तो किससे!
गाँव के सभी छोटे-बड़े महाजनों से तो
मुँह चुराना पड़ता था।
मजूरी भी करे, तो किसकी।
जेठ में अपना ही काम
ढेरों था।
ऊख की सिंचाई लगी हुई थी; लेकिन ख़ाली पेट मेहनत भी
कैसे हो!
साँझ हो गयी थी।
छोटा बच्चा रो रहा था।
माँ को भोजन न मिले,
तो दूध कहाँ से
निकले?
सोना परिस्थिति समझती थी; मगर रूपा क्या समझे!
बार-बार
रोटी-रोटी चिल्ला रही थी।
दिन-भर तो
कच्ची अमिया से जी बहला;
मगर अब तो कोई ठोस चीज़ चाहिए।
होरी दुलारी सहुआइन से अनाज
उधार माँगने गया था;
पर वह दूकान बन्द करके पैठ चली गयी थी।
मँगरू साह ने केवल इनकार ही न
किया, लताड़ भी दी -- उधार माँगने चले
हैं, तीन साल से
धेला सूद नहीं दिया, उस पर उधार दिये जाओ।
अब आकबत में देंगे।
खोटी नीयत हो जाती है, तो यही हाल होता है।
भगवान् से भी यह अनीति नहीं
देखी जाती।
कारकुन की डाँट पड़ी, तो कैसे चुपके से रुपए
उगल दिये।
मेरे रुपए,
रुपए ही नहीं हैं।
और मेहरिया है कि उसका मिज़ाज ही
नहीं मिलता।
वहाँ से रुआँसा होकर उदास
बैठा था कि पुन्नी आग लेने आयी।
रसोई के द्वार पर जाकर देखा तो
अँधेरा पड़ा हुआ था।
बोली -- आज
रोटी नहीं बना रही हो क्या भाभी जी?
अब तो बेला हो गयी।
जब से गोबर भागा था, पुन्नी और धनिया में
बोलचाल हो गयी थी।
होरी का एहसान भी मानने लगी थी।
हीरा को अब वह गालियाँ देती थी
-- हत्यारा, गऊ-हत्या, करके भागा।
मुँह में कालिख लगी
है, घर कैसे
आये?
और आये भी तो घर के अन्दर
पाँव न रखने दूँ।
गऊ-हत्या करते
इसे लाज भी न आयी।
बहुत अच्छा होता, पुलिस बाँधकर ले जाती और चक्की
पिसवाती!
धनिया कोई बहाना न कर सकी।
बोली --
रोटी कहाँ से बने, घर में दाना तो है ही नहीं।
तेरे महतो ने बिरादरी का पेट
भर दिया, बाल-बच्चे मरें या जियें।
अब बिरादरी झाँकती तक नहीं।
पुन्नी की फ़सल अच्छी हुई थी, और वह स्वीकार करती थी कि यह होरी
का पुरुषार्थ है।
हीरा के साथ कभी इतनी बरक्कत न हुई थी।
बोली -- अनाज
मेरे घर से क्यों नहीं मँगवा
लिया?
वह भी तो महतो ही की कमाई है कि किसी
और की?
सुख के दिन आयें, तो लड़ लेना; दुख तो साथ रोने ही से कटता
है।
मैं क्या ऐसी अन्धी हूँ कि
आदमी का दिल नहीं पहचानती।
महतो ने न सँभाला होता,
तो आज मुझे कहाँ
सरन मिलती।
वह उलटे पाँव लौटी और
सोना को भी साथ लेती गयी।
एक क्षण में दो डल्ले अनाज से
भरे लाकर आँगन में रख दिये।
दो मन से कम जौ न था।
धनिया अभी कुछ कहने न पायी थी कि वह फिर
चल दी और एक क्षण में एक बड़ी-सी टोकरी अरहर कौ दाल से भरी हुई
लाकर रख दी, और बोली
-- चलो, मैं आग जलाये देती हूँ।
धनिया ने देखा तो जौ के
ऊपर एक छोटी-सी डलिया
में चार-पाँच
सेर आटा भी था।
आज जीवन में पहली बार वह परास्त
हुई।
आँखों में प्रेम और
कृतज्ञता के मोती भरकर बोली -- सब का सब उठा लायी कि घर में भी
कुछ छोड़ा?
कहीं भाग जाता था?
आँगन में बच्चा खटोले पर
पड़ा रो रहा था।
पुनिया उसे गोद में
लेकर दुलराती हुई बोली -- तुम्हारी दया से अभी बहुत है
भाभीजी!
पन्द्रह मन तो जौ हुआ है
और दस मन गेहूँ।
पाँच मन मटर हुआ, तुमसे क्या छिपाना है।
दोनों घरों का काम चल
जायगा।
दो-तीन
महीने में फिर मकई हो जायगी।
आगे भगवान् मालिक है।
झुनिया ने आकर अंचल से
छोटी सास के चरण छुए।
पुनिया ने असीस दिया।
सोना आग जलाने चली, रूपा ने पानी के लिए कलसा उठाया।
रुकी हुई गाड़ी चल निकली।
जल में अवरोध के कारण जो
चक्कर था, फेन था,
शोर था, गति की तीव्रता थी, वह अवरोध के हट जाने से शान्त
मधुर-ध्वनि के साथ
सम, धीमी, एक-रस धार
में बहने लगी।
पुनिया बोली -- महतो को डाँड़ देने की
ऐसी जल्दी क्या पड़ी थी?
धनिया ने कहा -- बिरादरी में सुरख़रू कैसे
होते।
' भाभी, बुरा न मानो, तो एक बात कहूँ? '
' कह, बुरा क्यों
मानूँगी? '
' न
कहूँगी, कहीं
तुम बिगड़ने न लगो? '
' कहती
हूँ, कुछ न
बोलूँगी, कह
तो। '
' तुम्हें झुनिया को घर
में रखना न चाहिये था। '
' तब क्या
करती?
वह डूबी मरती थी। '
' मेरे घर
में रख देती।
तब तो कोई कुछ न कहता। '
' यह तो
तू आज कहती है।
उस दिन भेज देती, तो झाड़ू लेकर दौड़ती! '
' इतने ख़रच
में तो गोबर का ब्याह हो जाता। '
' होनहार
को कौन टाल सकता है पगली!
अभी इतने ही से गला नहीं छूटा
भोला अब अपनी गाय के दाम माँग रहा है।
तब तो गाय दी थी कि मेरी सगाई कहीं
ठीक कर दो।
अब कहता है,
मुझे सगाई नहीं करनी, मेरे रुपए दे दो।
उसके दोनों बेटे लाठी
लिये फिरते हैं।
हमारे कौन बैठा है, जो उससे लड़े!
इस सत्यानासी गाय ने आकर चौपट कर
दिया। '
कुछ और बातें करके
पुनिया आग लेकर चली गयी।
होरी सब कुछ देख रहा था।
भीतर आकर बोला -- पुनिया दिल की साफ़ है।
' हीरा भी तो
दिल का साफ़ था? '
धनिया ने अनाज तो रख लिया था;
पर मन में लज्जित और
अपमानित हो रही थी।
यह दिनों का फेर है कि आज उसे
यह नीचा देखना पड़ा।
' तू किसी का
औरसान नहीं मानती,
यही तुझमें बुराई है। '
' औरसान
क्यों मानूँ?
मेरा आदमी उसकी गिरस्ती के पीछे जान
नहीं दे रहा है?
फिर मैंने दान थोड़े ही लिया
है।
उसका एक-एक दाना भर
दूँगी। '
मगर पुनिया अपनी जिठानी के
मनोभाव समझकर भी होरी का एहसान चुकाती जाती
थी।
जब यहाँ अनाज चुक जाता, मन दो मन दे जाती; मगर जब चौमासा आ गया और
वर्षा न हुई, तो
समस्या अत्यन्त जटिल हो गयी।
सावन का महीना आ गया था और
बगूले उठ रहे थे।
कुओं का पानी भी सूख गया था
और ऊख ताप से जली जा रही थी।
नदी से थोड़ा-थोड़ा पानी मिलता था; मगर उसके पीछे आये दिन लाठियाँ
निकलती थीं।
यहाँ तक कि नदी ने भी जवाब दे दिया।
जगह-जगह
चोरियाँ होने लगीं, डाके पड़ने लगे।
सारे प्रान्त में हाहाकार मच गया।
बारे कुशल हुई कि भादों
में वर्षा हो गयी और किसानों
के प्राण हरे हुए।
कितना उछाह था उस दिन!
प्यासी पृथ्वी जैसे अघाती ही न थी
और प्यासे किसान ऐसे उछल रहे थे
मानो पानी नहीं,
अशफिऱ्याँ बरस रही हों।
बटोर लो,
जितना बटोरते
बने।
खेतों में जहाँ
बगूले उठते थे, वहाँ हल चलने लगे।
बालवृन्द निकल-निकलकर तालाबों और
पोखरों और गड़हियों का
मुआयना कर रहे थे।
ओहो!
तालाब तो आधा भर गया, और वहाँ से गड़हिया की तरफ़
दौड़े।
मगर अब कितना ही पानी बरसे, ऊख तो बिदा हो गयी।
एक-एक हाथ ही
होके रह जायगी, मक्का
और जुआर और कोदो से लगान
थोड़े ही चुकेगा, महाजन का पेट थोड़े ही भरा जायगा।
हाँ,
गौओं के लिए चारा हो गया और आदमी
जी गया।
जब माघ बीत गया और भोला के रुपए
न मिले, तो एक दिन वह
झल्लाया हुआ होरी के घर आ धमका और
बोला -- यही है
तुम्हारा क़ौल?
इसी मुँह से तुमने ऊख
पेरकर मेरे रुपए देने का वादा किया
था?
अब तो ऊख पेर चुके।
लाओ रुपए मेरे हाथ
में!
होरी जब अपनी विपत्ति सुनाकर
और सब तरह चिरौरी करके हार गया और
भोला द्वार से न हटा, तो उसने झुँझलाकर कहा
-- तो महतो,
इस बखत तो मेरे पास
रुपए नहीं हैं और न मुझे कहीं
उधार ही मिल सकते हैं।
मैं कहाँ से लाऊँ?
दाने-दाने
की तंगी हो रही है।
बिस्वास न हो,
घर में आकर देख लो।
जो कुछ मिले, उठा ले जाओ।
भोला ने निर्मम भाव से कहा
-- मैं तुम्हारे
घर में क्यों तलासी लेने जाऊँ
और न मुझे इससे मतलब है कि
तुम्हारे पास रुपये हैं या नहीं।
तुमने ऊख पेरकर रुपये
देने को कहा था।
ऊख पेर चुके।
अब मेरे रुपए मेरे हवाले
करो।
' तो फिर
जो कहो, वह
करूँ? '
' मैं क्या
कहूँ? '
' मैं
तुम्हीं पर छोड़ता हूँ। '
' मैं
तुम्हारे दोनों बैल खोल ले
जाऊँगा। '
होरी ने उसकी ओर विस्मय-भरी आँखों से
देखा, मानो अपने
कानों पर विश्वास न आया हो।
फिर हतबुद्धि-सा सिर झुकाकर रह गया।
भोला क्या उसे भिखारी बनाकर छोड़ देना
चाहते हैं?
दोनों बैल चले
गये, तब तो उसके
दोनों हाथ ही कट जायँगे।
दीन स्वर में बोला -- दोनों बैल ले
लोगे, तो
मेरा सर्वनाश हो जायगा।
अगर तुम्हारा धरम यही कहता है, तो खोल ले जाओ।
' तुम्हारे
बनने-बिगड़ने की
मुझे परवा नहीं है।
मुझे अपने रुपए चाहिए। '
' और जो
मैं कह दूँ,
मैंने रुपए दे दिये? '
भोला सन्नाटे में आ गया।
उसे अपने कानों पर विश्वास
न आया।
होरी इतनी बड़ी बेईमानी कर सकता
है, यह सम्भव नहीं।
उग्र होकर बोला -- अगर तुम हाथ में गंगाजली
लेकर कह दो कि मैंने रुपए दे
दिये, तो सबर कर
लूँ।
' कहने का मन
तो चाहता है, मरता
क्या न करता; लेकिन
कहूँगा नहीं। '
' तुम कह ही
नहीं सकते। '
' हाँ
भैया, मैं
नहीं कह सकता।
हँसी कर रहा था।
एक क्षण तक वह दुबिधे में पड़ा रहा।
फिर बोला --
तुम मुझसे इतना बैर क्यों पाल
रहे हो भोला भाई!
झुनिया मेरे घर में आ
गयी, तो मुझे
कौन-सा सरग मिल गया।
लड़का अलग हाथ से गया, दो सौ रुपया डाँड़ अलग भरना पड़ा।
मैं तो कहीं का न रहा।
और अब तुम भी मेरी जड़ खोद
रहे हो।
भगवान् जानते हैं, मुझे बिलकुल न मालूम
था कि लौंडा क्या कर रहा है।
मैं तो समझता था, गाना सुनने जाता होगा।
मुझे तो उस दिन पता चला,
जब आधी रात को झुनिया घर
में आ गयी।
उस बखत मैं घर में न
रखता, तो
सोचो, कहाँ
जाती?
किसकी होकर रहती?
झुनिया बरौठे के द्वार पर छिपी
खड़ी यह बातें सुन रही थी।
बाप को अब वह बाप नहीं, शत्रु समझती थीं।
डरी, कहीं
होरी बैलों को दे न दें।
जाकर रूपा से बोली -- अम्माँ को जल्दी से बुला ला।
कहना, बड़ा काम
है, बिलम न करो।
धनिया खेत में गोबर
फेंकने गयी थी,
बहू का सन्देश सुना, तो आकर बोली -- काहे को बुलाया बहू, मैं तो घबड़ा गयी।
' काका को
तुमने देखा है न? '
' हाँ
देखा, क़साई की तरह द्वार
पर बैठा हुआ है।
मैं तो बोली भी
नहीं। '
' हमारे
दोनों बैल माँग रहे
हैं, दादा से।
'
धनिया के पेट की आँतें भीतर
सिमट गयीं।
दोनों बैल माँग रहे
हैं? '
' हाँ,
कहते हैं या तो
हमारे रुपए दो, या हम
दोनों बैल खोल ले
जायँगे। '
' तेरे दादा
ने क्या कहा? '
' उन्होंने कहा, तुम्हारा धरम कहता हो, तो खोल ले जाओ। '
' तो
खोल ले जाय;
लेकिन इसी द्वार पर आकर भीख न माँगे,
तो मेरे नाम पर
थूक देना।
हमारे लहू से उसकी छाती जुड़ाती
हो, तो जुड़ा
ले। '
वह इसी तैश में बाहर आकर होरी
से बोली -- महतो
दोनों बैल माँग रहे
हैं, तो दे
क्यों नहीं देते? '
उनका पेट भरे, हमारे भगवान् मालिक हैं।
हमारे हाथ तो नहीं काट
लेंगे?
अब तक अपनी मजूरी करते थे,
अब दूसरों की मजूरी
करेंगे।
भगवान् की मरज़ी होगी, तो फिर बैल-बधिये हो जायँगे, और मजूरी ही करते
रहे, तो कौन
बुराई है।
बूड़ेसूखे और
जोत-लगान का बोझ
तो न रहेगा।
मैं न जानती थी, यह हमारे वैरी हैं, नहीं गाय लेकर अपने सिर पर
विपत्ति क्यों लेती!
उस निगोड़ी का पौरा जिस दिन से
आया, घर तहस-नहस हो गया।
भोला ने अब तक जिस शस्त्र को छिपा
रखा था, अब उसे
निकालने का अवसर आ गया।
उसे विश्वास हो गया
बैलों के सिवा इन सबों के पास
कोई अवलम्ब नहीं है।
बैलों को बचाने के लिए
ये लोग सब कुछ करने को तैयार
हो जायँगे।
अच्छे निशानेबाज़ की तरह मन को साधकर
बोला -- अगर तुम
चाहते हो कि हमारी बेइज़्ज़ती हो और
तुम चैन से बैठो, तो यह न होगा।
तुम अपने दो सौ को
रोते हो।
यहाँ लाख रुपए की आबरू बिगड़ गयी।
तुम्हारी कुशल इसी में है कि
जैसे झुनिया को घर में रखा
था, वैसे ही घर से
उसे निकाल दो, फिर न
हम बैल माँगेंगे, न गाय का दाम माँगेंगे।
उसने हमारी नाक कटवाई है, तो मैं भी उसे
ठोकरें खाते देखना चाहता हूँ।
वह यहाँ रानी बनी बैठी रहे,
और हम मुँह में
कालिख लगाये उसके नाम को रोते
रहें, यह नहीं
देख सकता।
वह मेरी बेटी है, मैंने उसे गोद में
खिलाया है, और
भगवान् साखी है,
मैंने उसे कभी बेटों से कम
नहीं समझा; लेकिन आज
उसे भीख माँगते और घूर पर दाने
चुनते देखकर मेरी छाती सीतल हो जायगी।
जब बाप होकर मैंने अपना हिरदा
इतना कठोर बना लिया है, तब सोचो, मेरे दिल पर कितनी बड़ी चोट लगी
होगी।
इस मुँहजली ने सात पुस्त का
नाम डुबा दिया।
और तुम उसे घर में रखे
हुए हो, यह मेरी
छाती पर मूँग दलना नहीं तो और क्या
है!
धनिया ने जैसे पत्थर की लकीर
खींचते हुए कहा --
तो महतो मेरी भी सुन लो।
जो बात तुम चाहते हो,
वह न होगी, सौ जनम न होगी।
झुनिया हमारी जान के साथ है।
तुम बैल ही तो ले जाने
को कहते हो,
ले जाओ; अगर
इससे तुम्हारी कटी हुई नाक जुड़ती हो,
तो जोड़ लो; पुरखों की आबरू बचती
हो, तो बचा लो।
झुनिया से बुराई ज़रूर हुई।
जिस दिन उसने मेरे घर में
पाँव रखा, मैं
झाड़ू लेकर मारने उठी थी; लेकिन जब उसकी आँखों से
झर-झर आँसू बहने
लगे, तो
मुझे उस पर दया आ गयी।
तुम अब बूढ़े हो गये
महतो!
पर आज भी तुम्हें सगाई की धुन
सवार है।
फिर वह तो अभी बच्चा है।
भोला ने अपील भरी आँखों
से होरी को देखा -- सुनते हो होरी इसकी
बातें!
अब मेरा दोस नहीं।
मैं बिना बैल लिये न
जाऊँगा।
होरी ने दृढ़ता से कहा -- ले जाओ।
' फिर रोना मत
कि मेरे बैल खोल ले गये!
'
' नहीं
रोऊँगा। '
भोला बैलों की पगहिया
खोल ही रहा था कि झुनिया चकतियोंदार साड़ी
पहने, बच्चे को
गोद में लिये, बाहर निकल आयी और कम्पित स्वर में
बोली -- काका, लो मैं इस घर से निकल
जाती हूँ और जैसी तुम्हारी
मनोकामना है, उसी तरह
भीख माँगकर अपना और बच्चे का पेट
पालूँगी, और जब
भीख भी न मिलेगी,
तो कहीं डूब मरूँगी।
भोला खिसियाकर बोला -- दूर हो मेरे सामने
से।
भगवान् न करे मुझे फिर तेरा
मुँह देखना पड़े।
कुलच्छिनी,
कुल-कलंकिनी कहीं की।
अब तेरे लिए डूब मरना ही उचित
है।
झुनिया ने उसकी ओर ताका भी
नहीं।
उसमें वह क्रोध था, जो अपने को खा जाना चाहता
है, जिसमें
हिंसा नहीं,
आत्मसमर्पण है।
धरती इस वक़्त मुँह खोलकर उसे
निगल लेती, तो वह
कितना धन्य मानती!
उसने आगे क़दम उठाया।
लेकिन वह दो क़दम भी न गयी थी कि धनिया
ने दौड़कर उसे पकड़ लिया और
हिंसा-भरे स्नेह
से बोली -- तू
कहाँ जाती है बहू,
चल घर में।
यह तेरा घर है, हमारे जीते भी और हमारे
मरने के पीछे भी।
डूब मरे वह, जिसे अपनी सन्तान से बैर हो।
इस भले आदमी को मुँह से
ऐसी बात कहते लाज नहीं आती।
मुझ पर धौंस जमाता है
नीच!
ले जा,
बैलों का रकत पी ।।।
झुनिया रोती हुई बोली
-- अम्माँ, जब अपना बाप होके मुझे धिक्कार
रहा है, तो
मुझे डूब ही मरने दो।
मुझ अभागिनी के कारन तो
तुम्हें दु:ख ही मिला।
जब से आयी,
तुम्हारा घर मिट्टी में मिल गया।
तुमने इतने दिन मुझे जिस
परेम से रखा, माँ
भी न रखती।
भगवान् मुझे फिर जनम
दें; तो
तुम्हारी कोख से दें, यही मेरी अभिलाषा है।
धनिया उसको अपनी ओर खींचती
हुई बोली -- वह
तेरा बाप नहीं है,
तेरा बैरी हैं;
हत्यारा।
माँ होती,
तो अलबत्ते उसे कलक होता।
ला सगाई।
मेहरिया जूतों से न
पीटे, तो कहना!
झुनिया सास के पीछे-पीछे घर में चली गयी।
उधर भोला ने जाकर दोनों
बैलों को खूँटों से
खोला और हाँकता हुआ घर चला, जैसे किसी नेवते
में जाकर पूरियों के बदले
जूते पड़े हों -- अब करो खेती और बजाओ
बंसी।
मेरा अपमान करना चाहते हैं
सब, न जाने कब का बैर
निकाल रहे हैं,
नहीं, ऐसी लड़की को
कौन भला आदमी अपने घर में रखेगा।
सब के सब बेसरम हो गये
हैं।
लौंडे का कहीं ब्याह न होता
था इसी से।
और इस राँड़ झुनिया की ढिठाई
देखो कि आकर मेरे सामने खड़ी हो
गयी।
दूसरी लड़की होती, तो मुँह न दिखाती।
आँख का पानी मर गया है।
सब के सब दुष्ट और मूरख भी
हैं।
समझते हैं, झुनिया अब हमारी हो गयी।
यह नहीं समझते जो अपने बाप
के घर न रही, वह किसी के
घर नहीं रहेगी।
समय ख़राब है,
नहीं बीच बाज़ार में इस चुड़ैल धनिया
के झोंटे पकड़कर घसीटता।
मुझे कितनी गालियाँ देती थी।
फिर उसने दोनों
बैलों को देखा, कितने तैयार हैं।
अच्छी जोड़ी है।
जहाँ चाहूँ, सौ रुपए में बेच सकता
हूँ।
मेरे अस्सी रुपए खरे हो
जायँगे।
अभी वह गाँव के बाहर भी न निकला था कि
पीछे से दातादीन,
पटेश्वरी, शोभा
और दस-बीस आदमी और
दौड़े आते दिखायी दिये।
भोला का लहू सर्द हो गया।
अब फ़ौजदरी हुई; बैल भी छिन जायँगे, मार भी पड़ेगी।
वह रुक गया कमर कसकर।
मरना ही है तो लड़कर मरेगा।
दातादीन ने समीप आकर कहा -- यह तुमने क्या अनर्थ किया
भोला ऐं!
उसके बैल खोल लाये, वह कुछ बोला नहीं, इसीसे सेर हो गये।
सब लोग अपने-अपने काम में लगे थे,
किसी को ख़बर भी न हुई।
होरी ने ज़रा-सा इशारा कर दिया होता, तो तुम्हारा एक-एक बाल चुन जाता।
भला चाहते हो, तो ले चलो बैल, ज़रा भी भलमंसी नहीं है
तुममें।
पटेश्वरी बोले -- यह उसके सीधेपन का फल है।
तुम्हारे रुपये उस पर आते
हैं, तो जाकर
दिवानी में दावा करो, डिग्री कराओ।
बैल खोल लाने का
तुम्हें क्या अख़्तियार है?
अभी फ़ौजदारी में दावा कर दे
तो बँधे-बँधे फिरो।
भोला ने दबकर कहा -- तो लाला साहब, हम कुछ ज़बरदस्ती थोड़े ही खोल
लाये।
होरी ने ख़ुद दिये।
पटेश्वरी ने शोभा से कहा
-- तुम बैलों
को लौटा दो शोभा।
किसान अपने बैल ख़ुशी से
देगा, तो इन्हें
हल में जोतेगा।
भोला बैलों के सामने
खड़ा हो गया।
हमारे रुपए दिलवा दो हमें
बैलों को लेकर क्या करना है।
हम बैल लिये जाते
हैं, अपने रुपए
के लिए दावा करो और नहीं तो मारकर गिरा
दिये जाओगे।
रुपए दिये थे नगद
तुमने?
एक कुलच्छिनी गाय बेचारे के सिर
मढ़ दी और अब उसके बैल खोले लिये
जाते हो। '
भोला बैलों के सामने
से न हटा।
खड़ा रहा गुमसुम, दृढ़, मानो
मारकर ही हटेगा।
पटवारी से दलील करके वह कैसे
पेश पाता?
दातादीन ने एक क़दम आगे बढ़कर अपनी
झुकी कमर को सीधा करके ललकारा -- तुम सब खड़े ताकते क्या
हो, मार के भगा दो
इसको।
हमारे गाँव से बैल खोल
ले जाएगा।
बंशी बलिष्ठ युवक था।
उसने भोला को ज़ोर से धक्का
दिया।
भोला सँभल न सका, गिर पड़ा।
उठना चाहता था कि बंशी ने फिर एक
घूँसा दिया।
होरी दौड़ता हुआ आ रहा था।
भोला ने उसकी ओर दस क़दम बढ़कर
पूछा -- ईमान से कहना
होरी महतो,
मैंने बैल ज़बरदस्ती खोल
लिये?
दातादीन ने इसका भावार्थ किया
-- यह कहते हैं कि
होरी ने अपने ख़ुशी से बैल
मुझे दे दिये।
हमी को उल्लू बनाते हैं।
होरी ने सकुचाते हुए कहा
-- यह मुझसे कहने
लगे या तो झुनिया को घर से निकाल
दो, या मेरे रुपए
दो, नहीं तो
मैं बैल खोल ले जाऊँगा।
मैंने कहा, मैं बहु को तो न
निकालूँगा, न
मेरे पास रुपए हैं; अगर तुम्हारा धरम कहे, तो बैल खोल लो।
बस,
मैंने इनके धरम पर छोड़ दिया और
इन्होंने बैल खोल लिये।
पटेश्वरी ने मुँह लटकाकर कहा
-- जब तुमने धरम पर
छोड़ दिया, तब कोई की
ज़बरदस्ती।
उसके धरम ने कहा, लिये जाता है।
जाओ भैया, बैल तुम्हारे हैं।
दातादीन ने समर्थन किया
-- हाँ, जब धरम की बात आ गयी, तो कोई क्या कहे।
सब के सब होरी को तिरस्कार की
आँखों से देखते परास्त होकर
लौट पड़े और विजयी भोला शान से
गर्दन उठाये बैलों को ले चला।
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Recoded: 20 Sept. 1999 to 6 Oct 1999.
Chapter Fourteen posted: 13 Oct. 1999.