यूनिवर्सिटी ऑफ़ मिशिगन

ईदगाह: Part One

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         रमज़ान के पूरे तीस रोज़ों के बाद ईद आयी है।  कितना मनोहर,  कितना सुहावना प्रभात है।  वृक्षों पर कुछ अजीब हरियाली है,  खेतों में कुछ अजीब रौनक है,  आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है।  आज का सूर्य देखो,  कितना प्यारा,  कितना शीतल है मानो संसार को ईद की बधाई दे रहा है।  गाँव में कितनी हलचल है।  [5]  ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं।  किसी के कुरते में बटन नहीं है।  पड़ोस के घर से सुई-तागा लेने दौड़ा जा रहा है।  किसी के जूते कड़े हो गये हैं;  उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है।  जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें।  [10]  ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जायगा।  तीन कोस का पैदल रास्ता,  फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना,  दोपहर के पहले लौटना असम्भव है।  लड़के सबसे ज़्यादा प्रसन्न हैं।  किसी ने एक रोज़ा रखा है,  वह भी दोपहर तक,  किसी ने वह भी नहीं;  लेकिन ईदगाह जाने की ख़ुशी उनके हिस्से की चीज़ है।  रोज़े बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे।  [15]  इनके लिए तो ईद है।  रोज़ ईद का नाम रटते थे;  आज वह आ गयी।  अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यों नहीं चलते।  इन्हें गृहस्थी की चिंताओं से क्या प्रयोजन !  सेवैयों के लिए दूध और शक्कर घर में है या नहीं,  इनकी बला से,  ये तो सेवैयाँ खायँगे।  [20]  वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी क़ाइम-अली के घर दौड़े जा रहे हैं।  उन्हें क्या ख़बर कि चौधरी आज आँखें बदल लें,  तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाय।  उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है।  बार-बार जेब से अपना ख़ज़ाना निकाल कर गिनते हैं और ख़ुश हो कर फिर रख लेते हैं।  महमूद गिनता है,  एक-दो,  दस-बारह !  [25]  उसके पास बारह पैसे हैं।  मोहसिन के पास एक,  दो,  तीन,  आठ,  नौ,  पंद्रह पैसे हैं।  इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीज़ें लायेंगे  ---  खिलौने,  मिठाइयाँ,  बिगुल,  गेंद और जाने क्या-क्या।  और सबसे ज़्यादा प्रसन्न है हामिद।  वह चार-पाँच साल का ग़रीब-सूरत,  दुबला-पतला लड़का,  जिसका बाप गत वर्ष हैज़े की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गयी।  [30]  किसी को पता न चला,  क्या बीमारी है।  कहती तो कौन सुननेवाला था।  दिल पर जो कुछ बीतती थी,  वह दिल में ही सहती थी और जब न सहा गया तो संसार से विदा हो गयी।  अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन्न है।  उसके अब्बाजान रुपये कमाने गये हैं।  [35]  बहुत-सी थैलियाँ ले कर आयेंगे।  अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीज़ें लाने गयी हैंइसलिए मिद प्रसन्न है।  आशा तो बड़ी चीज़ है,  और फिर बच्चों की आशा !  उनकी कल्पना तो राई का पर्वत बना लेती है।  हामिद के पाँव में जूते नहीं हैं,  सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी है,  जिसका गोटा काला पड़ गया है,  फिर भी वह प्रसन्न है।  [40]  जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें ले कर आयेंगी,  तो वह दिल के अरमान निकाल लेगा।  तब देखेगा महमूद,  मोहसिन,  नूरे और सम्मी कहाँ से उतने पैसे निकालेंगे।  अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है।  आज ईद का दिन और उसके घर में दाना नही.ाम्प्ऌह२४८ऌ !  आज आबिद होता तो क्या इसी तरह ईद आती और चली जाती !  [45]  इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही हैं।  किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को ?  इस घर में उसका काम नहीं;  लेकिन हामिद !  उसे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब?   उसके अंदर प्रकाश है,  बाहर आशा।  [50]  विपत्ति अपना सारा दलबल ले कर आये,  हामिद की आनंद-भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।
 
     हामिद भीतर जा कर दादी से कहता है --- तुम डरना नहीं अम्माँ,  मैं सबसे पहले आऊँगा।  बिलकुल न डरना।
 
     अमीना का दिल कचोट रहा है।  गाँव के बच्चे अपने
-अपने बाप के साथ जा रहे हैं।  [55]  हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है !  उसे कैसे अकेले मेले जाने दे ?  उस भीड़-भाड़ में बच्चा कहीं खो जाय तो क्या हो ?  नहीं,   अमीना उसे यों न जाने देगी।  नन्हीं सी जान !  [60]  तीन कोस चलेगा कैसे !  पैर में छाले पड़ जायँगे।  जूते भी तो नहीं हैं।  वह थोड़ी-थोड़ी .ग्त्ऌूर पर उसे गोद ले लेगी;  लेकिन यहाँ सेवैयाँ कौन पकायेगा ?  पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती।  [65]  यहाँ तो घंटों चीज़ें जमा करते लगेंगे।  माँगे ही का तो भरोसा ठहरा।  उस दिन फ़हीमन के कपड़े सिले थे।  आठ आने पैसे मिले थे।  उस अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गयी तो क्या करती !  [70]  हामिद के लिए कुछ नहीं है,  तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही।  अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं।  तीन पैसे हामिद की जेब में,  पाँच अमीना के बटुवे में।  यही तो बिसात है और ईद का त्योहार,  अल्लाह ही बेड़ा पार लगाये।  धोबन और नाइन और मेहतरानी और चूड़िहारिन सभी तो आयेंगी।  [75]  सभी को सेवैयाँ चाहिए और थोड़ा किसी की आँखों नहीं लगता।  किस-किस से मुँह चुरायेगी।  और मुँह क्यों चुराये ?  साल-भर का त्योहार है।  ज़िंदगी ख़ैरियत से रहे,  उनकी तक़दीर भी तो उसी के साथ है।  [80]  बच्चे को ख़ुदा सलामत रखे,  ये दिन भी कट जायँगे।
 
     गाँव से मेला चला।  और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था।  कभी सब के सब दौड़ कर आगे निकल जाते।  फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े हो कर साथवालों का इंतज़ार करते।  [85]  ये लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं !  हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गये हैं।  वह कभी थक सकता है !  शहर का दामन आ गया।  सड़क के दोनों ओर अमीरों के बग़ीचे हैं।  [90]  पक्की चार-दीवारी बनी हुई है।  पेड़ों में आम और लीचियाँ लगी हुई हैं।  कभी-कभी कोई लड़का कँकड़ी उठा कर आम पर निशाना लगाता है।  माली अंदर से गाली देता हुआ निकलता है।  लड़के वहाँ से एक फर्लांग पर हैं।  [95]  ख़ूब हँस रहे हैं।  माली को कैसे उल्लू बनाया है।
 
     बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं।  यह अदालत है,  यह कालेज है,  यह क्लब-घर है !  इतने बड़े कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे ?  [100]  सब लड़के नहीं हैं जी !  बड़े-बड़े आदमी हैं,  सच !  उसकी बड़ी-बड़ी मूँछें हैं।  इतने बड़े हो गये,  अभी तक पढ़ते जाते हैं।  न जाने कब तक पढ़ेंगे और क्या करेंगे इतना पढ़ कर !  [105]  हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़े-बड़े लड़के हैं,  बिलकुल तीन कौड़ी के।  रोज़ मार खाते हैं,  काम से जी चुरानेवाले।  इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे और क्या।  क्लब-घर में जादू होता है।  सुना है,  यहाँ मुरदे की खोपड़ियाँ दौड़ती हैं।  [110]  और बड़े-बड़े तमाशे होते हैं,  पर किसी को अंदर नहीं जाने देते।  और यहाँ शाम को साहब लोग खेलते हैं।  बड़े-बड़े आदमी खेलते हैं,  मूँछों-दाढ़ीवाले।  और मेमें भी खेलती हैं,  सच !  हमारी अम्माँ को वह दे दो,  क्या नाम है,  बैट,  तो उसे पकड़ ही न सकें।  [115]  घुमाते ही लुढ़क न जायँ।
 
     महमूद ने कहा --- हमारी अम्मीजान का तो हाथ काँपने लगे,  अल्ला क़सम।
 
     मोहसिन बोला --- चलो,  मनों आटा पीस डालती हैं।  ज़रा-सा बैट पकड़ लेंगी,  तो हाथ काँपने लगेंगे।  सैकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं।  [120]  पाँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है।  किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े तो आँखों तले अँधेरा आ जाय।
 
     महमूद --- लेकिन दौड़तीं तो नहीं,  उछल-कूद तो नहीं सकती।
 
     मोहसिन --- हाँ,  उछल-कूद नहीं सकती;  लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गयी थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी,  अम्माँ इतनी तेज़ दौड़ीं कि मैं उन्हें न पा सका,  सच !
 
     आगे चले।  [125]  हलवाइयों की दूकानें शुरू हुईं।  आज ख़ूब सजी हुई थीं।  इतनी मिठाइयाँ कौन खाता है ?  देखो न,  एक-एक दूकान पर मनों होंगी।  सुना है,  रात को जिन्नात आ कर ख़रीद ले जाते हैं।  [130]  अब्बा कहते थे कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है,  वह तुलवा लेता है और सचमुच के रुपये देता है,  बिलकुल ऐसे ही रुपये।
 
     हामिद को यक़ीन न आया --- ऐसे रुपये जिन्नात को कहाँ से मिल जायँगे ?
 
     मोहसिन ने कहा --- जिन्नात को रुपये की क्या कमी ?   जिस ख़जाने में चाहें चले जायँ।  लोहे के दरवाज़े तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब,  आप हैं किस फेर में !  [135]  हीरेजवाहरात तक उनके पास रहते हैं।  जिससे ख़ुश हो गये उसे टोकरों जवाहरात दे दिये।  अभी यहीं बैठे हैं,  पाँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जायँ।
 
    हामिद ने फिर पूछा --- जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं ?
     मोहसिन --- एक-एक आसमान के बराबर होता है जी।  [140]  ज़मीन पर खड़ा हो जाय तो उसका सिर आसमान से जा लगे,  मगर चाहे तो एक लोटे मे घुस जाय।
     हामिद --- लोग उन्हें कैसे खुश करते होंगे।  कोई मुझे वह मंतर बता दे तो एक जिन्न को खुश कर लूँ।
     मोहसिन ---- अब यह तो मैं नहीं जानता,  लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहुत से जिन्नात हैं।  कोई चीज चोरी हो जायचौधरी साहब उसका पता लगा देंगे और चोर का नाम भी बता देंगे।  [145]   जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था।   तीन दिन हैरान हुए,  कहीं न मिला तब झक: मार कर चौधरी के पास गये।   चौधरी ने तुरंत बता दिया कि मवेशीखाने में है,  और वहीं मिला।  जिन्नात आ कर उन्हें सारे जहान की ख़बरें दे जाते हैं।
     अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है,  और क्यों उनका इतना सम्मान है।  [150]
     आगे चले।  यह पुलिस लाइन है।  यहीं सब कानिसटिबल क़वायद करते हैं।  रैटन !  फ़ाय फो !  [155]  रात को बेचारे घूम-घूम कर पहरा देते है,  नहीं चोरियाँ हो जायँ।  मोहसिन ने प्रतिवाद किया ----- यह कानिसटिबिल पहरा देते हैं !  तभी तुम बहुत जानते हो।  अजी हज़रत,  यही चोरी कराते हैं।  शहर के जितने चोर-डाकू हैं,  सब इनसे मिले रहते हैं।  [160]  रात को ये लोग चोरों से तो कहते हैं,  चोरी करो और आप दूसरे मुहल्ले में जा कर जागते रहो !  जागते रहो ! पुकारते हैं  जभी इन लोगों के पास इतने रुपये आते हैं।  मेरे मामूँ एक थाने में कानिसटिबिल हैं।  [165]  बीस रुपये महीना पाते हैं;  लेकिन पचास रुपये घर भेजते हैं।  अल्ला कसम !  मैंने एक बार पूछा था कि मामूँआप इतने रुपये कहाँ से पाते हैं ?  हँस कर कहने लगे --- बेटा अल्लाह देता है।  फिर आप ही बोले ---- हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लायें।  [170]  हम तो इतना ही लेते हैंजिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाय।
     हामिद ने पूछा --- यह लोग चोरी करवाते हैंतो कोई इन्हें पकड़ता नहीं ?
     मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखा कर बोला -- अरे पागलइन्हें कौन पकड़ेगा ?  पकड़नेवाले तो यह लोग खुद हैंलेकिन अल्लाह इन्हें सजा भी खूब देता है।  हराम का माल कराम में जाता है।  [175]  थोड़े ही दिन हुए मामूँ के घर में आग लग गयी।  सारी लेई-पूँजी जल गयी।  एक बरतन तक न बचा।  कई दिन पेड़ के नीचे सोयेअल्ला कसमपेड़ के नीचे !  फिर न जाने कहाँ से एक सौ कर्ज लाये तो बरतन-भाड़े आये।  [180]
     हामिद ---- एक सौ तो पचास से ज्यादा होते हैं ?
       ' कहाँ पचास कहाँ एक सौ।  पचास एक थैली-भर होता है।  सौ तो दो थैलियों में भी न आवें। '
 अब बस्तो घनी होने लगी।  [185]  ईदगाह जानेवालों की टोलियाँ नज़र आने लगीं।  एक से एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए।  कोई इक्के-ताँगे पर सवार,  कोई मोटर पर,  सभी इत्र में बसे,  सभी के दिलों में उमंग।  ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर,  संतोष और धैर्य में मगन चला जा रहा था।  बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं।  [190]  जिस चीज़ की ओर ताकते,  ताकते ही रह जाते और पीछे से बराबर हार्न की आवाज़ होने पर भी न चेतते।  हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा।
        सहसा ईदगाह नज़र आया।  ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है।  नीचे पक्का फ़र्श है,  जिस पर जाजिम बिछा हुआ है।  [195]  और रोज़ेदारों की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गयी हैंपक्की जगत के नीचे तकजहाँ जाजिम भी नहीं है।  नये आनेवाले आ कर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं।  आगे जगह नहीं है।  यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता।  इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं।  [200]  इन ग्रामीणों ने भी वज़ू किया और पिछली पंक्ति में खड़े हो गये।  कितना सुंदर संचालन है,  कितनी सुंदर व्यवस्था !  लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं,  फिर सब के सब एक साथ खड़े हो जाते हैं,  एक साथ झुकते हैं,  और एक साथ घुटनों के बल बैठ जाते हैं।  कई बार यही क्रिया होती है,  जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जायँ,  और यही क्रम चलता रहे।  कितना अपूर्व दृश्य था,  जिसकी सामूहिक क्रियाएँ,  विस्तार और अनंतता हृदय की श्रद्धा,  गर्व और आत्मानंद से भर देती थी,  मानो भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोये हुए है।  [205]
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Part 1 keyed in by  विवेक अगरवाल mid June 2001. First half of Part 1 posted 23 June 2001. Second half of Part 1 posted 16-17 and 23 July 2001. Corrected (in part) 21 Sep 2001. Quintilineated by  विवेक अगरवाल in July 2002.